FACTORY SE FOOTPATH TAK: Robot ke Daur Mei Suzuki ke Majdoor

Nandita Haksar, Rashmi Chaudhuri (Translator)
ISBN: 9789350029640 Categories: , ,

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ISBN9789350029640

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जब मारुति सुजुकी के अस्थायी मज़दूरों को पता चला कि हरियाणा के सोनीपत जिले के खरखौदा में एक विशाल फैक्ट्री का निर्माण हो रहा है तो उन्होंने इसका मतलब यह समझा कि और भी नौकरियों के अवसर बनने वाले हैं। लेकिन यह जानकर वे हैरान रह गए कि उसमें कोई स्थायी नौकरी है ही नहीं। सुजुकी अपने कार्यबल को स्थायी नौकरियों से हटाकर अप्रेंटिस, अस्थायी और ठेका मज़दूरों की श्रेणियों में तब्दील कर रहा था जिनके वेतन स्थायी मजदूरों के वेतनों के आधे से भी कम होते थे। । शुरू- शुरू में मज़दूरों को लगा था कि सुजुकी भी आमतौर पर कंपनियों द्वारा अधिक-से-अधिक लाभ कमाने की मनोवृत्ति का शिकार होने के कारण स्थायी रूप से मज़दूरों की नियुक्तियां नहीं कर रही है। लेकिन जल्दी ही उन्हें यह समझ आ गया कि उनकी यह चाल उससे कहीं ज़्यादा धूर्ततापूर्ण थी : ऑटोमोटिव उद्योग में रोबोट्स को इंसान की जगह स्थापित किया जा रहा था। आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस पर आधारित नई तकनीक और रोबोटिक्स ने चौथी औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया जिसके फलस्वरूप रोजगार रहित भविष्य का सृजन हो रहा था ।

ऐसी परिस्थिति में अव्यवस्थित और असुरक्षित मज़दूरों को संगठित करना ट्रेड यूनियनों के लिए एक बड़ी चुनौती है। सुजुकी के कुछ मज़दूर अब गिग वर्कर बन चुके हैं, और इनकी इस दुनिया में काम करने की स्थिति कारखानों से भी बदतर है। यह पुस्तक पहली बार आक्रामक ट्रेड यूनियन विरोधी प्रथाओं, तकनीकी बदलावों, मज़दूरों के अधिकार और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर बढ़ते कंपनियों के नियंत्रण जैसे मुद्दों पर सवाल खड़े करती है। मज़दूर वर्ग पर रोबोटिक्स का प्रभाव डालने वाली यह पहली पुस्तक होगी।

नंदिता हक्सर मानवाधिकार अधिवक्ता, आंदोलनकर्ता और शिक्षिका के रूप में कार्यरत रही हैं। उन्होंने २० से ज़्यादा किताबें लिखी हैं। उनकी किताबें कश्मीर में ट्रेड यूनियन आंदोलन से लेकर भारत में शरणार्थियों के रूप में रह रहे उत्तरपूर्व से आए प्रवासी मज़दूरों के काम करने की स्थिति तक के मुद्दों को उठाती हैं। उनकी कृतियां भारत के संघर्षरत इलाकों में हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ को उठाती हैं।

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