Dastan-E-Cine Studio (1917-1950)
₹1,200.00
Additional information
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| ISBN | 9788199024847 |
Description
फिल्म उद्योग के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन फिल्मों की जन्मस्थली (स्टूडियोज) के बारे में छिटपुट लेखों के सिवाए कुछ नहीं छपा। इस पुस्तक दास्तान-ए-सिने स्टूडियो में फिल्मों की जन्मस्थली – स्टूडियोज का विस्तार से वर्णन किया गया है, जैसे फालके, इम्पीरियल, कोहिनूर, शारदा, मादन, प्रभात, न्यू थियेटर्स, बॉम्बे टॉकीज, सागर, प्रकाश, रणजीत, वाडिया, मिनर्वा, कारदार, मेहबूब, ए.के. स्टूडियो आदि प्रमुख हैं। स्टूडियो केवल निर्माणगृह (प्रोडक्शन हाउस) नहीं हैं। वे ऐसी संस्थाएं हैं जो रचनात्मकता को बढ़ावा देती हैं, तकनीक में निवेश करती हैं, प्रतिभाओं का विकास करती हैं और राष्ट्र की सांस्कृतिक कहानी को आकार देती हैं। सिनेमा जगत के प्रमुख स्टूडियो की कहानियों को सुनाने की कोशिश इस पुस्तक में की गई है, जहाँ तालियों की गूंज, स्क्रिप्ट की सरसराहट, किंवदंतियों के जन्म की सिहरन और बहुत कुछ।
विजय रंचन: अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) से 2002 में पूर्वकाश के बाद कला, साहित्य, संगीत और संस्कृति के विभिन्न आयामों पर लेखन और व्याख्यान में मस्त। हिंदी, अंग्रेजी एवं गुजराती में कई पुस्तकें प्रकाशित। उनमें से कुछ पुस्तकें – बॉलीवुड और रामकथा, बॉलीवुड का राष्ट्रवाद, द स्टोरी ऑफ बॉलीवुड सॉन्ग्स, द जीनियस ऑफ मास्टर सहगल और ऑल द वे सहगल। दुर्भाग्यवश लम्बी बीमारी से दिसंबर 2025 में निधन।
प्रवीण दवे: मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर। शुरू से ही लेखन कार्य में रुचि। 1982 में आकाशवाणी में नियुक्ति। हिंदी व गुजराती में रेडियो (आकाशवाणी) व दूरदर्शन के लिए नाटकों व धारावाहिकों के लेखन तथा प्रसारण में व्यस्त। सूचना एवं प्रसारण विभाग, गुजरात सरकार के 500 से ज्यादा दस्तावेजी चित्रों का लेखन व निर्माण। आकाशवाणी अहमदाबाद से सेवा निवृत्त। गुजराती तथा हिंदी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित। कंकू थी कसूम्बो नामक पुस्तक विजय रंचन जी के साथ सहलेखन।




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