Champaran mei Neel Sangharsh ke Sipahi (1867-1918)

Ashok Anshuman, Pushpa Kumari, Sanjeet Kumar, Sunny Kumar
ISBN: 9788198958358 Categories: ,

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ISBN9788198958358

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इतिहास लेखन में चंपारण के नीलहों के विरूद्ध संघर्ष की गाथा गांधी के नेतृत्व में संपन्न चंपारण-सत्याग्रह (1917 ई.) पर मूलतः केन्द्रित है। इसके बरक्श यह पुस्तक नील-संघर्ष के छोटे-छोटे नैरेटिव्स पर दृष्टिपात करती है, जो अब तक इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं पा सके हैं। उल्लेखनीय है कि नील उत्पादन के विरूद्ध संघर्ष की प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से आरंभ होकर गांधी के चंपारण प्रस्थान (1918 ई.) के बाद भी निरंतर जारी रही। इन संघर्षों की अगुवाई स्थानीय रैयतों के बीच से उभरे नेतृत्व एवं शिक्षकों ने की और इन्होंने चंपारण सत्याग्रह के पश्चात् भी नीलहों एवं प्रशासनिक तंत्र के अत्याचार के खिलाफ अपने संघर्ष के तेवर को बरकरार रखा जो असहयोग आंदोलन (1921 ई.) में भी परिलक्षित होते हैं।

अशोक आंशुमन लंगट सिंह महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर के इतिहास विभाग के अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। इनके शोध – आलेख एवं पुस्तकें औपनिवेशिककालीन बिहार के इतिहास पर केन्द्रित हैं।

पुष्पा कुमारी लंगट सिंह महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर के इतिहास विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। इनके शोध – विषय औपनिवेशिक बिहार में रेलवे के विस्तार तथा चंपारण में नील उत्पादन से जुड़े पहलुओं से संबद्ध हैं।

संजीत कुमार बी. आर. ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से इतिहास विषय से पीएचडी तक की शिक्षा प्राप्त किये हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् द्वारा प्रकाशित – ‘द डिक्शनरी ऑफ मार्टियर्स’ में भी योगदान दिया है। वर्तमान में बिहार राज्य अभिलेखागार में पुरालेखपाल के पद पर कार्यरत हैं।

सन्नी कुमार बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से अपना शोध-कार्य इतिहास विषय में पूरा किया है। वर्तमान में अतिथि शिक्षक हैं।

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